मेरी प्रयागराज महाकुंभ काशी और मथुरा की यात्रा
त्रिवेणी संगम त्रिवेणी और कुछ नहीं त्रिगुणात्मक प्रकृति से सुसर्जित हमारा अस्तित्व मात्र है जहां गंगा कर्म और व्यवहार की नदी है यमुना भक्ति और प्रेम की नदी है सरस्वती ज्ञान और अनुभव की नदी है जिस प्रकार हमारा कर्म हमारे समक्ष व्यक्त होता है अभिव्यक्त होता है प्रकट होता है इस प्रकार प्रेम और भक्ति की अभिव्यक्ति होती है तथा बोध और प्रज्ञा इसकी धारा इन दोनों के मध्य सूक्ष्म भाव से प्रवाहित होती रहती है इस प्रकार यह तीन नदिया कर्म बोध और प्रेम आपस में एक दूसरे को सिंचित करती है एक दूसरे के साथ जोड़ बनाते हैं तो वहां संगम होता है और इसी संगम तट पर परमात्मिक कृपा से अमृत वर्षा होती है अतः जब हम अपने जीवन में प्रज्ञा भक्ति और कर्म तीनों में समन्वय पैदा कर लेते हैं अर्थात ईश्वर बोध प्रेम में किये गये कर्मो मे तल्लीन हो जाते है तब कहीं हमारे शरीर के भीतर गंगा रूपी इंगला नाडी यमुना रूपी पिंगला नाडी और सरस्वती रूपी शुषुम्न्ना नाडी जागृत होकर हमें परम तत्व का बोध कराती है जिससे हमारे जीवन में इस महाकुंभ की उत्पत्ति हो जाती है और हम ईश्वर के अमृत भाव में डुबकी लगाकर पवित्र होते जाते हैं और मुक्त भी।
इसे बध जीव मुक्त होकर अमर हो जाता है इस अमृत की कामना चाहना और भावना का नाम महा कुंभ है। जो प्रत्येक 12 वर्ष में एक बार हमें अवसर देता है हमें अपने आप को जगाने का और प्रज्ञा के तट पर बैठकर इस स्थूल रूप से प्रवाहित गंगा यमुना और संगम का दर्शन करते हुए उसके जल का आचमन करते हुए ईश्वर के भाव में डूब जाना और उसे अनंत सत्य को प्राप्त करना जिसमें मोक्ष का अमृत है उस परम ईश्वर के चरणपद को प्राप्त करना आनंद ही आनंद है और उस आध्यात्मिक क्षेत्र में प्रवेश कर जाना जहां हम मरण धर्मा जीव से बदलकर स्वयं सच्चिदानंद रूप में प्रवेश कर जाते हैं।
बनारस अर्थात काशी
बनारस की यात्रा के दौरान हमारे समाज मे प्रचलित एक प्रसंग याद आया जो पहले संस्कारों का अभिन्न अंग हुआ करता था जो समय के साथ ओर "मेकाले" की शिक्षा नीति के बाद बंद सा होगया ।
दरसअल सनातन संस्कृति मे यज्ञोपवीत संस्कार प्रमुख संस्कारों मे से एक है उस समय संस्कार के बाद बालक शिक्षा ग्रहण करे गुरुकुल जाते थे ओर शिक्षा पुर्ण होने पर घर आते थे जिनका स्वागत ढोल नगाड़े से किया जाता था कालांतर मे हमारे समाज मे जब यज्ञोपवीत संस्कार होता है तो उसके पश्चात अक्सर यह कहा जाता है कि बटुक को शिक्षा ग्रहण हेतु काशी जाना होगा और उसको प्रतिकात्मक रुप से दौड़ाया जाता है जो अब एक केवल रस्म मात्र रह गई है चुंकि पौराणिक काल मे काशी गुरुकुल शिक्षा का केंद्र हुआ करती थी। काशी जो ज्ञान का, अध्यात्म का, संगीत का ,शिक्षा का केंद्र हुआ करती थी इसलिए यह व्यवस्था थी ।
काशी जहा पर संगीत को , धार्मिक ग्रंथों को आध्यात्म को नव तरूणाई मिली जो भोलेनाथ की नगरी भी है आलौकिक और मोक्षदायिनी गंगा के तट पर उस पावन धरा की रज का तिलक करने का सौभाग्य मिला उस पावन धरा को छूने का उन बनारसी गलियों में घूमने का उन चौरासी घाट पर जाकर, जानने का प्रयास किया कि अध्यात्म क्या है और मोक्ष क्या है।
बनारस जिसका शाब्दिक अर्थ है रस मे रसा बसा अर्थात ऐसा शहर जिके कण कण मे आध्यात्मिकता, संगीत, संस्कृति अपणायत रसी बसी हो वही बनारस है ।
बनारस की गलियों मे घूमकर लगा मानो अपने शहर जोधपुर मे ही घुम रहे है।
बनारस की बात हो रही हो ओर वहा के घाटों की बात न हो ऐसा हो नही सकता मेरे हृदय के नजदीक दो ऐसे ही घाटो की चर्चा आ करते है ।
दशाश्वमेध शब्द राजशी समप्रभुता का प्रतीक है। दशाश्वमेध घाट परम पावन वाराणसी और जीवनदायिनी गंगा के बीच शाश्वत बंधन का प्रतीक है। यह घाट वाराणसी के पूरे आध्यात्मिक वातावरण में हृदयस्थल की तरह है ।
वही गंगा के पावन-निर्मल प्रवाह के बीच एक आत्मिक शांति की अनुभूति होती है।
मणिकर्णिका यहा सती माता के कुण्डल गीरे थे इसलिए इसका नाम मणिकर्णिका पडा यहा शक्ति पीठ भी है । इसी घाट पर भगवान महादेव ने सती माता का अंतिम संस्कार किया था ।
जहा दशाश्वमेध संप्रभुता का प्रतीक तो मणिकर्णिका अंतिम सत्य का, जहा सब की शान सम हो जाती है वही शमशान है।
यहा व्यक्ति मां गंगा की गोद मे मोक्ष की ओर गतिमान हो जाता है।
इन दोनो घाटों से यह सीख मिलती है कि जहां मनुष्य जीवन पर्यंत संप्रभुता के घोड़े दौडाता है परंतु उस दौड़ का जहां अंत होता है वही अंतिम सत्य है जहा पर संप्रभुता के वनिस्पत आपके किए गए कर्म आध्यात्मिक ज्ञान चेतना के आधार पर मोक्ष प्राप्ति मिल सकती है ।
काशी और मथुरा जाकर जो मेरे मन और मस्तिष्क में कुछ प्रश्न उत्पन्न हूवे कि
जब कंकड़-कंकड़ पत्थर-पत्थर चिख चिख कर बोल रहा है नन्दी जी क्रंदन पुकार चिख रही है ओर बोल रही है देखो मेरा मुंह किस ओर है, मंदिर की दिवारो पर क्रुरता के बोझ के निसान गुंबद के रुप मे हम पर हंस रहे है । दिवारो पर धार्मिक चिन्ह अपनी गाथा गा रहे है नन्दी की चीर प्रतिक्षा प्रमाणित कर रही है तो फिर शाशन प्रशासन क्यों खामोश दीवारों सा खड़ा है।
इस पुण्य भुमि की रज को माथे पर लगाने का अवसर मिला यह दृश्य देखकर अंतर्मन भावुक और अभिभुत हुआ ।
मेरी प्रयागराज महाकुंभ काशी और मथुरा की यात्रा ✍️ #DPthought
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