अंगीठी
सिगड़ी इसका नाम है। संस्कृत में इसका "अग्नीष्टिका" नाम आग के लिए जमाई जाने वाली ईंटों के कारण हुआ सिगड़ी को दादी खुद ही बना लेतीं। बाद मे लोह धातु से इसका निर्माण होने लगाजब गैस नही थी तो हर घर मे यह मिल जाया करती थी । घर मे खाना पकाने से लेकर सर्दी मे तप करने के साथ साथ भोजन की पौष्टिकता को भी बढाती थी। इसलिए इसको धार्मिक रीति रिवाज मे भी जोडा गया इसलिए
सर्दी में मंदिर में अंगीठी को ईंधन सहित दान भी किया जाता। कभी कभी अखाड़ा, मठ के महाराज को भी देकर पुण्य पाते।
भविष्योत्तर पुराण में श्रीकृष्ण का वचन है :
आदौ मार्गशिरे मासि शोभने दिवसे शुभे।
अग्नीष्टिकां कारयित्वा सुखासनावर्ती दृढ़ाम।।
देवांगणे मठे हट्टे विस्तीर्णे चत्वरे तथा।
उभयो: संध्ययो: कृत्वा सु शुद्धकाष्ठसंचयम्...।।
कविमतिरिव बहुलोहा सुघटितचक्रा प्रभातवेलेव।
हरमूर्तिरिव हसन्ती भाति विधूमानलोपेता।। (भोजप्रबन्धः)
इसका अभिप्राय है कि हंसती हुई यह अंगीठी कवि की बुद्धि के समान 'बहुलोहा' है। सुबह के समान सुघटितचक्रा है और शिव की मूर्ति के समान विधूमानल है। इसके अर्थ को और गंभीरता से देखिए : बहुलोहा =बहु +लोहा, बहुल+ऊहा (कल्पना)। सुघटितचक्रा = सुन्दर चक्राकार, चकवा - चकवी का मिलन कराने वाली सुन्दर घड़ी (प्रातःकाल) और विधूमानल = धूम रहित अग्नि, विधु + उमा + अनल = चन्द्रमा, पार्वती और तृतीय नेत्राग्नि।
कितनी महिमा इस छोटे से अग्नियंत्र की रही है... अब गैस और हीटर के दौर में कहा है।
आज जब एकाएक तीव्र शीत लहर ने दस्तक दी तो इसकी याद आई
माताश्री और श्रीमति जी ने समय और ईधन का सदुपयोग लेते हुवे तप के साथ भोजन मी पका दिया।
आखिर मे मन की बात
गुज़रते दिसंबर के आख़िरी बचे दिनों में हवा का रुख बदल जाता हैं।
ठंड से गहराती शाम में खिड़की से आती शीत हवाओं में अजीब सी बेरुखी महसूस होने लगती हैं।
कितना भी ज्यादा ढक ले हम खुद को गर्म कपड़ों से, फिर भी ये ठंडी हवाएं अपना रास्ता खोज ही लेती हैं और शरीर के साथ मन भी सिकुड़ता जाता हैं।
कुछ यादें भी इन सर्द हवाओं जैसी ही हैं तमाम कोशिशों के बाद भी बंद दरवाजों के नीचे से होकर दबे पांव आ के बैठ जाती हैं सिरहाने।
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