ग्रीन एनर्जी और पर्यावरण

जलवायु परिवर्तन एक अस्तित्व संबंधी संकट है जो मानव इतिहास के क्रम को बदतर दिशा की ओर बदल देने की क्षमता रखता है। जीवाश्म ईंधन पारंपरिक ऊर्जा स्रोत हैं जो जलवायु परिवर्तन में सबसे बड़े योगदानकर्त्ता हैं। वे वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन के 75% से अधिक भाग के लिये और सभी कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जनों के लगभग 90% भाग के लिये ज़िम्मेदार हैं।
बेहतर भविष्य के लिये, हरित ऊर्जा एक प्रमुख समाधान है जिसके माध्यम से वर्ष 2070 तक भारत के शुद्ध शून्य उत्सर्जन के लक्ष्य को भी पूरा किया जा सकता है।
इस प्रकार, भारत को आर्थिक विकास के एक नए मॉडल का नेतृत्व करना चाहिये जो कार्बन-गहन दृष्टिकोण (जिसे अतीत में कई देशों ने अपनाया) से परहेज कर सके और स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण हेतु अन्य विकासशील अर्थव्यवस्थाओं के लिये एक खाका प्रदान करे।
हरित ऊर्जा वह ऊर्जा है जिसे एक विधि का उपयोग करके और एक स्रोत से उत्पादित किया जा सकता है, जिससे प्राकृतिक पर्यावरण को कोई नुकसान नहीं होता है।हवा, पानी या सूरज जैसे प्राकृतिक संसाधनों को प्राप्त करने से कई प्रकार की नवीकरणीय(अक्षय) ऊर्जा प्राप्त होती है।
सौर ऊर्जा सूर्य के प्रकाश से उत्पन्न एक नवीकरणीय ऊर्जा है, इसलिए यह एक आंतरायिक ऊर्जा भी है। यह सौर ऊर्जा का दो तरह से लाभ उठाता है: फोटोवोल्टिक प्रौद्योगिकी के साथ और थर्मल प्रौद्योगिकी के साथ । फोटोवोल्टिक सौर ऊर्जा फोटोवोल्टिक प्लेटों या पैनलों के उपयोग के माध्यम से सूर्य की किरणों को बिजली में परिवर्तित करती है, जबकि सौर तापीय ऊर्जा का उपयोग आम तौर पर घरेलू वॉटर हीटर जैसे तरल पदार्थ को गर्म करने के लिए किया जाता है।
पवन ऊर्जा हवा की ताकत पर निर्भर करती है। यह टर्बाइनों से आता है, जिन्हें पवन टर्बाइन या वायु टर्बाइन कहा जाता है, जो हवा की गतिज ऊर्जा को ऊर्जा में परिवर्तित करते हैं।
हाइड्रोलिक या जलविद्युत ऊर्जा जलविद्युत संयंत्रों के माध्यम से पानी की गतिज ऊर्जा को बिजली में बदल देती है। पवन या सौर ऊर्जा की तरह, जलविद्युत रुक-रुक कर होती है: यह पानी के प्रवाह (बांधों, नदियों, नालों, आदि) और वर्षा पर निर्भर करती है। दूसरे शब्दों में, वर्ष जितना सूखा होगा, जलविद्युत ऊर्जा का उत्पादन उतना ही कम होगा और इसके विपरीत।
भूतापीय ऊर्जा एक ऐसी प्रक्रिया है जो पृथ्वी की प्राकृतिक गर्मी का लाभ उठाती है और इसे ऊर्जा में परिवर्तित करती है। यह एकमात्र नवीकरणीय ऊर्जाओं में से एक है जो रुक-रुक कर नहीं होती है और इसलिए वायुमंडलीय स्थितियों पर निर्भर नहीं होती है।
बायोमास का उपयोग जैविक पौधों या जानवरों के अपशिष्ट के दहन या उनके किण्वन से निकलने वाली गर्मी से बिजली और ईंधन (उदाहरण के लिए, बायोगैस ) का उत्पादन करने के लिए किया जाता है। पौधों के अपशिष्ट से प्राप्त ऊर्जा में कार्बन तटस्थ होने का लाभ है । वास्तव में, पौधों के कचरे को जलाने से उतना ही CO2 उत्सर्जन होता है जितना कि यह प्रकाश संश्लेषण के दौरान अवशोषित होता है। यह जानना महत्वपूर्ण है कि बायोमास को केवल तभी नवीकरणीय ऊर्जा स्रोत माना जाता है जब इसकी खपत इसके पुनर्जनन से कम होती है। इसकी दो मुख्य उत्पादन तकनीकें इस प्रकार हैं:
बायोमास के दहन से बिजली पैदा होती है : इसके दहन के दौरान, जैविक अपशिष्ट (लकड़ी, कृषि अपशिष्ट, घरेलू अपशिष्ट) गर्मी और बिजली पैदा करते हैं।
बायोगैस का उत्पादन करने के लिए मीथेनेशन द्वारा बायोमास : इसके किण्वन के दौरान, जैविक अपशिष्ट (घरेलू, कृषि, कृषि-औद्योगिक) बायोगैस में बदल जाता है।
हरित ऊर्जा के कई फायदे हैं जिनमें शामिल हैं:
स्वच्छ ताक़त ;अक्षय ऊर्जा स्रोत ;
कोई कार्बन उत्सर्जन या ग्रीनहाउस गैसें नहीं ;
ऊर्जा स्वतंत्रता ;आत्मनिर्भर ;वहनीयता ;
पर्यावरण के अनुकूल और जलवायु परिवर्तन को धीमा करता है ।
भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा ऊर्जा उपभोगकर्त्ता देश है। वर्ष 2000 के बाद से ऊर्जा का उपयोग दोगुना हो गया है, जहाँ 80% मांग अभी भी कोयला, तेल और ठोस बायोमास द्वारा पूरी की जा रही है।
प्रति व्यक्ति आधार पर देखें तो भारत का ऊर्जा उपयोग और उत्सर्जन वैश्विक औसत के आधे से भी कम है।
वर्ष 2019 में भारत ने घोषणा की कि वह वर्ष 2030 तक नवीकरणीय (अक्षय) ऊर्जा की अपनी स्थापित क्षमता को 450 GW तक ले जाएगा।
उत्पादन-संबद्ध प्रोत्साहन योजना (PLI) नवीकरणीय ऊर्जा के लिये कच्चे माल के उत्पादन हेतु विनिर्माण क्षेत्र के संवर्द्धन के संबंध में भारत सरकार की एक और पहल है।
पीएम-कुसुम (प्रधानमंत्री-किसान ऊर्जा सुरक्षा एवं उत्थान महाभियान ) का लक्ष्य वर्ष 2025 तक 28000 मेगावाट की सौर ऊर्जा क्षमता का दोहन कर किसानों को वित्तीय एवं जल सुरक्षा प्रदान करना है।
जल पंपों का सोलराइज़ेशन उपभोक्ता के दरवाज़े पर उपलब्ध बिजली वितरण की दिशा में एक कदम है।
पीएम सूर्य घर मुफ्त बिजली योजना, राष्ट्रीय ग्रीनहाइड्रोजन मिशन सौर पीवी मॉड्यूल पीएलआई योजना के साथ समग्र नवीकरणीय ऊर्जा में विश्व स्तर पर चौथा स्थान।
गैर-जीवाश्म (नॉन-फॉसिल) ईंधन स्रोतों से 42 प्रतिशत संचयी स्थापित क्षमता: वर्ष 2030 तक 50 प्रतिशत का लक्ष्य।
वर्ष 2014-15 के बाद से नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादन (बड़ी जल विद्युत को छोड़कर) 61 बिलियन यूनिट से लगभग 3 गुना बढ़कर 180 बिलियन यूनिट हो गया है।
वर्ष 2014 के बाद से सौर ऊर्जा स्थापित क्षमता 2.6 गीगावॉट से लगभग 30 गुना बढ़कर 70.10 गीगावॉट हो गई है।
वर्ष 2014 के बाद से पवन विद्युत क्षमता 21 गीगावाट से दोगुना बढ़कर 42.6 गीगावाट हो गई।
वर्ष 2014 के बाद से लगभग 78 बिलियन डॉलर का निवेश (10.27 बिलियन डॉलर एफडीआई सहित)
विगत 5 वर्षों में 63 गीगावाट की तीसरी सबसे अधिक अक्षय ऊर्जा क्षमता वृद्धि।
वर्ष 2029-30 तक आईएसटीएस छूट, आरपीएस ट्रैजेक्ट्री जैसे नवोन्मेषी नीतिगत उपाय, हरित ऊर्जा खुली पहुंच नियमावली लागू की गई।इस प्रकार की योजनाओं के माध्यम से सरकार इस ओर सकारात्मक सोच के साथ बढ़ रही है। भविष्य की पीढ़ी को अगर स्वच्छ वातावरण देना है तो हमें आज से ही पर्यावरण को बेहतर बनाने के लिए काम करना होगा। बगैर प्रदूषण फैलाए ऊर्जा उपलब्ध कराने में सक्षम होने के नाते ओर बिजली की जरूरतों को पूरा करने के लिए इसे अपनाकर और अपने खर्चों को कम करके और पर्यावरण को स्वच्छ बनाएं रखने के लिए  प्रयासरत होना होगा ।

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