लोकमत परिष्कार से राष्ट्र उत्थान
भारत हजारो वर्षों से लोकतांत्रिक देश रहा है या यू कहे कि भारत के मूल में लोकतंत्र सदा ही रहा है।
प्राचीन काल मे भारत में सुदृढ़ व्यवस्था विद्यमान थी। इसके साक्ष्य हमें प्राचीन साहित्य, सिक्कों और अभिलेखों से प्राप्त होते हैं। विदेशी यात्रियों एवं विद्वानों के वर्णन में भी इस बात के प्रमाण हैं।
प्राचीन गणतान्त्रिक व्यवस्था में आजकल की तरह ही शासक एवं शासन के अन्य पदाधिकारियों के लिए निर्वाचन प्रणाली थी। योग्यता एवं गुणों के आधार पर इनके चुनाव की प्रक्रिया आज के दौर से थोड़ी भिन्न जरूर थी। सभी नागरिकों को वोट देने का अधिकार नहीं था। ऋग्वेद तथा कौटिल्य साहित्य ने चुनाव पद्धति की पुष्टि की है परंतु उन्होंने वोट देने के अधिकार पर रोशनी नहीं डाली है।
लोकमंगल, जनमत, सुशासन, सुव्यवस्था, स्वतंत्रता, समानता, न्याय, बंधुत्व की जड़ें रामराज्य से निकलती हैं। रामराज्य लोकोन्मुखी और जनवादी था। शासन में जन सामान्य की भागीदारी ही लोकतंत्र की रीढ़ होती है। राज्यसत्ता को जनता के प्रति जवाबदेह होना चाहिए। वहां एक सामान्य धोबी की आवाज भी सत्ता के समीकरण बदल देती है। उसे सुनना राज्य की जिम्मेदारी है। राम राज्य के प्रतीक हैं। वह दीनबंधु दीनानाथ, कृपानिधान हैं, राजतंत्र में प्रजातंत्र की ऐसी कल्पना तुलसी के दूरगामी चिंतन की अमूल्य निधि है। एक ऐसे लोकतंत्र की कल्पना जिसमें शासन, प्रकृति, परमात्मा और प्रजा के बीच सेतु है। लोकतांत्रिक समाज में किसी भी जाति का विरोध नहीं करते। उनके यहां सर्वधर्म सद्भाव है। इसलिए राम की जीत जनता की जीत होती थी। राम की मुश्किलें जनता की मुश्किलें होती थीं। राम ने साधारण जन को यही सिखाया कि अन्याय के खिलाफ लड़ो। जीतो। आजादी लो। जनता अगर सक्षम नेतृत्व में लड़ेगी, तो आजादी जरूर मिलेगी। रामराज्य उस युग की आशा, आकांक्षा का प्रतीक स्वप्न है। गांधी सिर्फ इसी रामराज्य को आदर्श लोकतंत्र मानते थे। उनके वैचारिक विरोधी सावरकर भी रामचरितमानस को लोकतंत्र का आदर्शशास्त्र कहते हैं। एक ऐसा शास्त्र जो लोकतंत्र की कहानी ही नहीं, लोकतंत्र का प्रहरी, प्रेरक और निर्माता भी है। सावरकर यह भी कहते हैं कि ‘जब तक हमारे यहां रामायण है कोई डिक्टेटर पनप नहीं सकता।’ लोकतंत्र में शासन, उसका धर्म, उसके कर्त्तव्य कैसे हों, उसकी शासन व्यवस्था, उसका बजट कैसा हो, इस सब पर तुलसी ने विचार किया है। राम लोक के प्रतिनिधि हैं। लोक जैसा व्यवहार करते हैं। लोक जैसा बनना चाहते हैं। चौदह बर्ष जनता के बीच रहकर जनता जैसा आचरण करते हैं। वह न राजा हैं, न भगवान। उनके सारे कार्य मानवीय हैं।
वर्तमान परिप्रेक्ष्य मे बात करे तो लोकमत के परिष्कार के लिए लोकमन का संस्कार आवश्यक है. लोकमत परिष्कार का मतलब केवल वोट देने वाले लोगों के मत का परिष्करण नहीं, बल्कि चुनाव लड़ने वाले लोगों के मत का भी परिष्करण होना चाहिए. लोकमत का अर्थ लोकतंत्र में सिर्फ वोट देने वाला ही नहीं, बल्कि चुनाव लड़नेवाला भी है.
लोकमन संस्कार, लोकमत परिष्कार और सतत लोक प्रशिक्षण से ही लोकतंत्र का आदर्श स्वरूप सामने आयेगा. यह दीनदयालजी के चिंतन में शामिल था. उन्होंने तीनों को एकसूत्र में पिरोकर जागरूक जनता के आधार पर रामराज्य की कल्पना की थी. उन्होने ने शासन में बैठे हुए लोगों को दीनदयाल जी का संपूर्ण चिंतन का मनन करते हुए राज-काज चलाने की सलाह दी, जिससे आदर्श लोकतंत्र की पुनः स्थापना भारतवर्ष में हो सके.
आज जन और तंत्र में स्वर्णिम संतुलन की आवश्यकता है. पाश्चात्य विचारधारा के प्रभाव में जन गौण हो गया है और तंत्र प्रभावी बन गया है. फलतः इंसान में निराशा, हताशा व कुंठा उत्पन्न हो रही है. पाश्चात्य लोकतंत्र से ज्यादा कुछ भी विभेदकारी नहीं है. इन सब का श्रेष्ठ विकल्प एकात्म मानव दर्शन है, जिसे पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने सबके सामने प्रस्तुत किया था. भारत में भले ही पहले राजशाही थी, लेकिन उसमें भी जनतंत्र दिखता था.
जन और तंत्र में स्वर्णिम संतुलन नहीं रहने के गंभीर परिणाम देखने को मिलते हैं और मिलेंगे. यदि जनतंत्र में तंत्र गौण हो जायेगा और जनता हावी हो जायेगी तो अराजक स्थिति सामने देखने को मिलेगी. वहीं अगर जनतंत्र में जनता गौण हो गई और तंत्र प्रमुख हो गया तो तानाशाही प्रवृत्ति हावी होगी।
भारतीय चिंतन लोकतंत्र का पुरजोर समर्थक है. यहां कन्याकुमारी से कश्मीर तक की शासन व्यवस्था बगैर किसी हिंसा के बदल जाती है. सांस्कृतिक राजधानी काशी में पतित पावनी गंगा का किनारा होने के बावजूद लोग गंगा माता की प्रतिमा बनाकर पूजन करते हैं तो वहीं प्रख्यात संत कबीर उच्चारित करते हैं- ‘पाथर पूजे हरि मिले, तो मैं पूजूं पहाड़.’ कोटि-कोटि देवता और करोड़ों योनि की जहां परिकल्पना की गई, वहीं सबके सामने भी चार्वाक ने उद्घोषित किया था- ‘यावत् जीवेत् सुखं जीवेत्. ऋणं कृत्वा घृतं पिबेत्..’ जब तक भारतीय मानस को समझा नहीं जायेगा, तब तक सिर्फ चिल्लाने से कुछ नहीं होने वाला. पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने चुनाव हारना स्वीकार किया परंतु सिद्धांतों के साथ समझौता नहीं किया. लोकतंत्र का सुनहरा अध्याय है कि जब पंडित जी ने चुनाव हारा तो सबसे पहले विजयी उम्मीदवार को बधाई दी तथा उस रात एक आम सभा कर विजयी प्रत्याशी को यह बताया था कि अब वह दल का प्रतिनिधि नहीं बल्कि जनता का प्रतिनिधि है.
एक इसी प्रकार का परिदृश्य हमने अटल जी की सरकार के समय देखा था जब केवल एक मत से अटल जी की सरकार गिर गई थी और उन्होंने अपना ऐतिहासिक उद्बोधन दिया था कहा था कि “सरकारे आएंगे सरकारे जाएंगे लेकिन यह देश रहना चाहिए” तो लोकतंत्र के माध्यम से इस देश को हम शुद्ध प्रगतिशील सुशासित संगठित न्याय प्रिय सुव्यवस्थित समृद्ध बंधुत्व भाव कैसे कर सकते है इस ओर ध्यान देने की आवश्यकता है।
भारतीय राजनीति में राजनीतिक दलों ने गत 7 दशकों में लोकमत को परिष्कृत करने के काम को लगातार नजरअंदाज किया है इसका परिणाम यह रहा है कि राजनीति में स्वार्थों के लिए जातिवाद धन बाहुबल का इस्तेमाल कर लोग जनप्रतिनिधित्व को दूषित कर रहे हैं आम आदमी जनप्रतिनिधि का अर्थ यह समझता है कि वह केवल उनके संसदीय क्षेत्र का प्रतिनिधि है जबकि ऐसा नहीं है वह भारतीय संसद का सदस्य है अर्थात पूरे भारतवर्ष का है उसकी भूमिका देश की संसद में बनने वाले कानूनों में सुधार एवं समय-समय पर होने वाले संवैधानिक संशोधनों पर अपने विचार प्रकट करना है बनने वाले कानूनों की व्याख्या करना है उसमें नीति सम्मत सुधार करना है कई बार यह देखने में आता है कि जब संसद का बजट सत्र चल रहा पर सांसदों की उपस्थिति बजट सत्र में बमुश्किल एक चौथाई भी नहीं रहती इससे लोकतंत्र कमजोर होता है मगर कभी भी मतदाता ने जनप्रतिनिधियों से यह जानने की कोशिश नहीं की कि वह बजट सत्र के दौरान महत्वपूर्ण काम छोड़कर यहां क्या कर रहे हैं। आज जरूरत है कि लोकमत को परिष्कृत करने के लिए प्रबुद्ध वर्ग को सामने आना होगा जिससे लोकतंत्र की जड़ें मजबूत होगी और जातिवाद भाषावाद के आधार पर राजनीति करने वाले व्यक्तियों और दल हतोत्साहित होंगे मेरा मानना है कि प्रबुद्ध वर्ग ओपिनियन मेकर की भूमिका निभाता है । यूरोप में भी लगभग ढाई सौ साल पूर्व इसी प्रकार का आंदोलन शुरू हुआ जिस में मतदाता को परिष्कृत करने का काम किया| मतदाता कैसे मतदान करें उसका जनप्रतिनिधि कैसा हो वह किस राजनीतिक दल से संबंध रखता है उसकी पृष्ठभूमि क्या है यह जानने के बाद ही मतदान करें दीनदयाल जी का मानना था कि परिष्कृत लोकमत ही स्वस्थ लोकतंत्र और लोकतांत्रिक परंपराओं को आगे ले जाने का काम करेगा वर्तमान समय में लोकमत को प्रभावित करने वाले कई कारक सक्रिय हैं ऐसे में जरूरत है कि प्रबुद्ध वर्ग जो सुप्तशक्ति ओर सृजनशक्ति के रूप मे ओपिनियन मेकर की भूमिका से आगे जाकर आसपास रहने वाले मतदाताओं को प्रबुद्ध बनाने का काम करें दलों के कार्यकर्ता भी चुनाव के समय को छोड़कर समय-समय पर मतदाता से संपर्क करें उसे बताने की कोशिश करें कि लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए किस प्रकार के जनप्रतिनिधियों का चयन करना चाहिए उन्हें शतप्रतिशत मत देना चाहिए नीतियों के पीछे समाज की शक्ति होनी चाहिए अर्थात मतदाता की शक्ति उसकी इच्छा होनी चाहिए इसलिए मतदाताओं को मतवान बनाने की ओर अग्रसर होना चाहिए।
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