किस्सा गांधी और गोडसे का


भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में कई गाथाए है, जिन्हें सुनते ही आज भी भारत के देशवासियों की आंखे भींग जाती हैं। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के विभिन्न पहलुओं में एक पहलू था राजनीतिक पहलू जिसमें सुभाष चंद्र बोस सरदार वल्लभभाई पटेल जवाहरलाल नेहरू और मोहनदास करमचंद गांधी या जिन्हें हम महात्मा गांधी और बापू के नाम से भी जानते हैं।
 गांधीजी भारत एवं भारतीय स्वतन्त्रता आन्दोलन के एक प्रमुख राजनैतिक एवं आध्यात्मिक नेता थे। वे सत्याग्रह (व्यापक सविनय अवज्ञा) के माध्यम से अत्याचार के प्रतिकार करने के समर्थक अग्रणी नेता थे, उनकी इस अवधारणा की नींव सम्पूर्ण अहिंसा के सिद्धान्त पर रखी गयी थी जिसने भारत सहित पूरे विश्व में जनता के नागरिक अधिकारों एवं स्वतन्त्रता के प्रति आन्दोलन के लिये प्रेरित किया। उन्हें संसार में साधारण जनता महात्मा गांधी के नाम से जानती है।  महात्मा अथवा 'महान आत्मा' एक सम्मान सूचक शब्द है। शास्त्रों में इसके लिए कहा गया है कि “मनस्येकं वाचस्येकं कर्मण्येकं महात्मानाम्” अर्थात मन वचन और वाणी से जो एक प्रकार के हो वोही महात्मा है ।लेकिन कुछ लोगो की उनके प्रति राय बिल्कुल भिन्न थी | बापू का जन्म  02 अक्टूबर 1869 गुजरात के पोरबंदर में मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ था। वे 1888 में लॉ की शिक्षा प्राप्त करने के लिए लंदन गये। अपनी क़ानूनी शिक्षा के बाद मई 1893 में बापू ने वकील के तौर पर काम करने के लिए दक्षिण अफ्रीका चले गए। वहां उन्होंने नस्लीय भेदभाव का प्रथम बार अनुभव किया। 9 जनवरी 1915 की सुबह जैसे ही  गांधीजी  अपोलो बंदरगाह पर उतरे , वैसे ही सभी कार्यकर्ताओं ने गांधी जी का  गर्मजोशी के साथ स्वागत किया था। 1893 में 24 साल की आयु में  गांधीजी दक्षिण अफ्रीका गए थे। लेकिन जब उनकी वापसी भारत में हुई तो ये 45 वर्ष के अनुभवी वकील बन चुके थे। देश लौटने पर 25 करोड़ लोगों की निगाहें मोहनदास करमचंद गांधी पर थीं और क्योंकि उन्होंने अफ्रीका में रहते हुए भी उन्होंने जो लड़ाई लड़ी, उससे देशवासियों में एक उम्मीद जगी कि गाँधी जी ही वे नेता है जो हमें आजादी दिला सकते हैं।
गांधी की हत्या करने वाले नाथूराम  गोडसे का जन्म 19 मई, 1910 को ब्रिटिश भारत के बॉम्बे प्रेसीडेंसी में स्थित बारामती जगह पर हुआ था। नाथूराम कहीं न कहीं उग्र हिंदूवादी विचारधारा से प्रभावित थे। नाथूराम गोडसे को लगता था, कि  गांधी मुस्लिमों को हिंदुओं की अपेक्षा अधिक ध्यान देते हैं। यही नहीं बल्कि गोडसे भारत और पाकिस्तान के बंटवारे को लेकर भी गांधी जी को ही दोषी मानते थे।
30 जनवरी 1948 की वह सुबह जब दिल्ली के बिड़ला हाउस स्थित प्रार्थना स्थल पर नाथूराम गोडसे द्वारा लगातार तीन गोलियां चलाई गई और उस गोलियों ने  गांधी की जिंदगी छीन ली। कहते हैं, जैसे ही गांधी मंच की ओर चले वैसे ही गोडसे भारी भीड़ से निकलकर गांधी के रास्ते पर आकर, उन पर गोलियां चला दीं। तत्काल गांधी जी जमीन पर गिर गए  और अस्पताल ले जाने की बजाय  उन्हें बिड़ला हाउस में उनके कमरे में ले जाया गया।  जहा पर उन्होंने पानी मांगा उन्हे पानी पिलाया गया ओर कुछ समय बाद ही पता चला की  गांधीजी की मृत्यु हो गई है। उसी समय गोडसे को भीड़ ने पकड़ लिया क्योंकि तब तक वे  अपने हाथों को ऊपर करके वही खड़े हुए थे  कुछ लोगों ने उन पर हमला किया और बाद मे पुलिस को सौंप दिया। 
गांधी हत्या का मुकदमा मई 1948 में दिल्ली के ऐतिहासिक लाल किले में शुरू किया गया और जिसमें गोडसे, मेन डिफ़ेन्डन्ट और उसके सहयोगी नारायण आप्टे और छह अन्य सह-प्रतिवादी माने गये। 
गिरफ़्तार होने के बाद गोडसे ने गांधी के पुत्र देवदास गांधी  को तब पहचान लिया था जब वे गोडसे से मिलने थाने पहुँचे थे. इस मुलाकात का जिक्र नाथूराम के भाई और सह अभियुक्त गोपाल गोडसे ने अपनी किताब गांधी वध क्यों, में किया है.
गोपाल गोडसे को फांसी नहीं हुई, क़ैद की सजा हुई थी. जब देवदास गांधी पिता की हत्या के बाद संसद मार्ग स्थित पुलिस थाने पहुंचे थे, तब नाथूराम गोडसे ने उन्हें पहचाना था.
गोपल गोडसे ने अपनी किताब में लिखा है, "देवदास शायद इस उम्मीद में आए होंगे कि उन्हें कोई वीभत्स चेहरे वाला, गांधी के खून का प्यासा कातिल नज़र आएगा, लेकिन नाथूराम सहज और सौम्य थे. उनका आत्म विश्वास बना हुआ था. देवदास ने जैसा सोचा होगा, उससे एकदम उलट."निश्चित तौर पर हम ये नहीं जानते कि वाकई में ऐसा रहा होगा
नाथूराम ने देवदास गांधी से कहा, "मैं नाथूराम विनायक गोडसे हूं. हिंदी अख़बार हिंदू राष्ट्र का संपादक. मैं भी वहां था (जहां गांधी की हत्या हुई). आज तुमने अपने पिता को खोया है. मेरी वजह से तुम्हें दुख पहुंचा है. तुम पर और तुम्हारे परिवार को जो दुख पहुंचा है, इसका मुझे भी बड़ा दुख है. कृप्या मेरा यक़ीन करो, मैंने यह काम किसी व्यक्तिगत रंजिश के चलते नहीं किया है, ना तो मुझे तुमसे कोई द्वेष है और ना ही कोई घृणा भाव."

देवदास ने तब पूछा, "तब, तुमने ऐसा क्यों किया?"

जवाब में नाथूराम ने कहा, "केवल और केवल राजनीतिक वजह से."

नाथूराम ने देवदास से अपना पक्ष रखने के लिए समय मांगा लेकिन पुलिस ने उसे ऐसा नहीं करने दिया. अदालत में नाथूराम ने अपना वक्तव्य रखा था, जिस पर अदालत ने पाबंदी लगा दी। 

गोपाल गोडसे ने अपनी पुस्तक के अनुच्छेद में नाथूराम की वसीयत का जिक्र किया है. जिसकी अंतिम पंक्ति है- "अगर सरकार अदालत में दिए मेरे बयान पर से पाबंदी हटा लेती है, ऐसा जब भी हो, मैं तुम्हें उसे प्रकाशित करने के लिए अधिकृत करता हूं."
अदालत मे पांच घंटे तक नाथुराम ने सिलसिलेवार घटनाओं का उल्लेख करते हुए गांधी जी के दोहरे चरित्र और पक्षपाती चरित्र को अदालत और जनता के सामने रखा यह सब सुनकर अदालत में सन्नाटा पसर गया और  लोगों को सोचने के लिए मजबूर होना पड़ा था।
 उसमें नाथूराम ने इन पहलुओं का ज़िक्र किया है-
पहली बात, वह गांधी का सम्मान करता था. उसने कहा था, "वीर सावरकर और गांधीजी ने जो लिखा है या बोला है, उसे मैंने गंभीरता से पढ़ा है. मेरे विचार से, पिछले तीस सालों के दौरान इन दोनों ने भारतीय लोगों के विचार और कार्य पर जितना असर डाला है, उतना किसी और चीज़ ने नहीं."
दूसरी बात, जो नाथूराम ने कही, "इनको पढ़ने और सोचने के बाद मेरा यकीन इस बात में हुआ कि मेरा पहला दायित्व हिंदुत्व और हिंदुओं के लिए है, एक देशभक्त और विश्व नागरिक होने के नाते. 30 करोड़ हिंदुओं की स्वतंत्रता और हितों की रक्षा अपने आप पूरे भारत की रक्षा होगी, जहां दुनिया का प्रत्येक पांचवां शख्स रहता है. इस सोच ने मुझे हिंदू संगठन की विचारधारा और कार्यक्रम के नज़दीक किया. मेरे विचार से यही विचारधारा हिंदुस्तान को आज़ादी दिला सकती है और उसे कायम रख सकती है."
इस नज़रिए के बाद नाथूराम ने गांधी के बारे में सोचा. "32 साल तक विचारों में उत्तेजना भरने वाले गांधी ने जब मुस्लिमों के पक्ष में अपना अंतिम उपवास रखा तो मैं इस नतीजे पर पहुंच गया कि गांधी के अस्तित्व को तुरंत खत्म करना होगा. गांधी ने दक्षिण अफ्रीका में भारतीय समुदाय के लोगों को हक दिलाने की दिशा में शानदार काम किया था, लेकिन जब वे भारत आए तो उनकी मानसिकता कुछ इस तरह बन गई कि क्या सही है और क्या गलत, इसका फैसला लेने के लिए वे खुद को अंतिम जज मानने लगे. अगर देश को उनका नेतृत्व चाहिए तो यह उनकी अपराजेयता को स्वीकार्य करने जैसा था.  इस सोच ने नाथूराम को गांधी की हत्या करने के लिए उकसाया जो की किसी भी रुप मे स्वीकारीय नही है।. नाथूराम ने भी कहा, "इस सोच के साथ दो रास्ते नहीं हो सकते. या तो कांग्रेस को गांधी के लिए अपना रास्ता छोड़ना होता और गांधी की सारी सनक, सोच, दर्शन और नजरिए को अपनाना होता या फिर गांधी के बिना आगे बढ़ना होता” ।
तीसरा आरोप ये था कि गांधी ने पाकिस्तान के निर्माण में मदद की. नाथूराम ने कहा, "जब कांग्रेस के दिग्गज नेता, गांधी की सहमति से देश के बंटवारे का फ़ैसला कर रहे थे, उस देश का जिसे हम पूजते रहे हैं, मैं भीषण ग़ुस्से से भर रहा था. व्यक्तिगत तौर पर किसी के प्रति मेरी कोई दुर्भावना नहीं है लेकिन मैं कहना चाहता हूं कि मैं मौजूदा सरकार का सम्मान नहीं करता, क्योंकि उनकी नीतियां मुस्लिमों के पक्ष में थीं. लेकिन उसी वक्त मैं ये साफ देख रहा हूं कि ये नीतियां केवल गांधी की मौजूदगी के चलते थीं."
उसकी सोच थी कि गांधी देश के बंटवारे के प्रति उत्साहित थे, जबकि इतिहास के मुताबिक मामला बिलकुल उल्टा था. उन्होंने कहा कि कांग्रेस में गांधी का हठधर्मिता पुर्ण व्यवहार था, लेकिन उन्होंने ये भी कहा कि कांग्रेस के अंदर अपनी बात मनवाने के लिए गांधी को भूख हड़ताल करनी पड़ती थी. 
 नाथूराम ने गांधी की अंतिम भूख हड़ताल (जो उन्होंने पाकिस्तान को फंड जारी करने से भारत के इनकार करने पर की थी) पर सवाल उठाए, लेकिन यह उन्होंने तब किया जब भारत अपने ही वादे से पीछे हट रहा था. गांधी ने इस मौके पर देश को सही एवं उपयुक्त रास्ता दिखाया था.
नाथूराम ने अदालत में जो भी कहा, तर्क के आधार पर उससे सहमत हुआ जा सकता है  । लेकिन किसी भी परिस्थिति में हत्या जैसे जघन्य अपराध को स्वीकार नहीं किया जा सकता है।
वह गांधी की मुस्लिम तुष्टिकरण की विचारधारा से नफ़रत करता था. जो वास्तविक हिंदू धर्म भाव के बिलकुल उलट था वही गांधी का कोई भी रास्ता या तरीका कैसा भी रहा हो. दशकों बाद भी एक राजनेता के तौर पर उनकी वैश्विक साख कायम है।

1949 में गांधी के बारे में जॉर्ज ऑरवैल ने लिखा था, "सौंदर्यबोध के लिहाज़ से कोई गांधी के प्रति वैमनस्य रख सकता है जैसा कि मैं महसूस कर रहा हूँ. कोई उनके महात्मा होने के दावे को भी खारिज कर सकता है (हालांकि महात्मा होने का दावा उन्होंने खुद कभी नहीं किया). कोई साधुता को आदर्श के तौर पर ही खारिज कर सकता है लेकिन एक राजनेता के तौर पर देखने पर और मौजूदा समय के दूसरे तमाम राजनेताओं से तुलना करने पर हम पाते हैंकि उन्होंने भारत के राजनैतिक परिदृश्य का पूरा चरित्र बदल दिया।  उन्होंने लाखों लोगों को जाति अत्याचार और सामाजिक अपमान के बंधनों से मुक्त कर दिया। उनके व्यक्तित्व के नैतिक प्रभाव और अहिंसा की तकनीक की तुलना नहीं की जा सकती। और ना ही इसकी कीमत किसी देश या पीढ़ी तक सीमित है। यह मानवता के लिए उनका अविनाशी उपहार है।

देवेन्द्र पुरोहित “देवेन्द्र देव”


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