प्रधानमंत्री जी की अमेरिका यात्रा में हुए रक्षा सौदे

“भारत हमेशा से शांति का पक्षधर रहा है!” प्रधानमंत्री जी की इस बात के पीछे एक बहुत बड़ी सोच है हम यह जानते हैं कि अहिंसा परमो धर्मा : धर्म हिंसा तदेवच: । अर्थात  यह है कि हम शांति के पक्ष में हैं लेकिन कई बार शांति को स्थापित करने के लिए कड़े कदम उठाने पड़ते हैं और उन कड़े कदमों को उठाने के लिए सक्षम होना पड़ता है जिसके लिए राजनीतिक आर्थिक सामरिक वैश्विक कुटनीक  रूप से सक्षम होना जरूरी हैं।
हमारी परंपरा भी यह संकेत करती है कि जो शक्तिशाली है उसी के सभी मित्र हैं। वर्तमान में भारत इसका सटीक उदाहरण  है क्योंकि भारत सक्षम भी है सामर्थ्य वान भी ओर शक्तिशाली भी और भारत में अपार संभावनाएं भी लोगों को दिख रही है इन्हीं सकारात्मकता के कारण विश्व के शक्तिशाली देश भारत की ओर देख रहे है। इसका एक कारण यह भी है कि भारत के वेद जहां यह कहते है कि हमे  अपराजेय चारित्रिक, मानसिक और आत्मिक बल का संचय करना चाहिए ओर कुटनीति राजनीति से ही परिस्थितियों का सामना करना चाहिए  वहि यह भी कहा गया है कि “कृते प्रतिकृतिं कुर्याद्विंसिते प्रतिहिंसितम् । तत्र दोषं न पश्यामि शठे शाठ्यं समाचरेत् “॥ जो आपके साथ जैसा बर्ताव करें उसके साथ वैसा ही करिए, हिंसा करने के वालों के साथ हिंसक रूप में ही आचरण करें। जिसके लिए राजनीतिक आर्थिक सामरिक वैश्विक कुटनीक  रूप से सक्षम होना जरूरी हैं। भारत इस और बहुत ही तीव्र गति से कार्य कर रहा है उसी के तहत भारत रक्षा के क्षेत्र में दिन प्रतिदिन नए-नए आयामों को जोड़ता जा रहा है  हाल ही में भारतीय प्रधानमंत्री जी की अमेरिका यात्रा इस लिहाज से अत्यधिक महत्वपूर्ण है क्योकि इसमे भविष्य को देखते हुए अत्यधिक महत्वपूर्ण निर्णय लिए गए है। जिसमे रक्षा के क्षेत्र मे हम बात करे तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी की इस यात्रा के दौरान भारत और अमेरिका के बीच सबसे अहम सौदा रक्षा क्षेत्र में हुआ. अमेरिकी कंपनी जनरल इलेक्ट्रिक (जीई) और हिंदुस्‍तान एयरोनॉटिक्‍स लिमिटेड (एचएएल) के बीच समझौता ज्ञापन (एमओए) हो गया है. इससे रक्षा क्षेत्र में बहु प्रतीक्षित विकास होगा. इस समझौते से अमेरिका से सबसे आधुनिक जेट इंजन तकनीक भारत को मिल सकेगी. जेट इंजन एफ 414 के संयुक्‍त निर्माण से दोनों देशों को फायदा होगा.इस डील के तहत भारत को कम से कम 11 अहम तकनीक ट्रांसफर किए जाने की संभावना है.
भारत के लिहाज़ से ये सबसे ज़्यादा अहम है क्योंकि इसके साथ ही भारत के साथ तकनीक साझा नहीं करने वाले दौर का अंत होने की शुरुआत हो गई है.
बीते सालों में भारत को उभरती हुई अहम तकनीकें हासिल करने से वंचित रखा गया था. साल 1960 से 1990 के दौर में भारत के प्रति इस रुख में काफ़ी सख़्ती आई थी.
साल 1974 में हुए भारत के पहले परमाणु परीक्षण के बाद न्यूक्लियर सप्लायर ग्रुप का गठन किया गया, जिससे भारत को बाहर रखा गया.
इसके बाद 1998 के परमाणु परीक्षण के बाद अटल बिहारी वाजपेयी को अमेरिका के नेतृत्व में दुनिया भर की आलोचना का सामना करना पड़ा.हालांकि, तत्कालीन भारतीय विदेश मंत्री जसवंत सिंह और अमेरिकी उप-विदेश मंत्री स्टॉब टेलबॉट के बीच साल 2000 के जनवरी में एक अहम बैठक हुई.इसके बाद साल 2000 के ही मार्च महीने में अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने भारत का दौरा किया जिसके बाद से भारत और अमेरिकी रिश्ते धीरे-धीरे मजबूत और परिपक्व हुए हैं.
क्लिंटन के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति बनने वाले जॉर्ज डब्ल्यू बुश के कार्यकाल में भारत और अमेरिका के बीच परमाणु समझौता हुआ, जिसने दोनों देशों के बीच रिश्तों को रणनीतिक स्तर पर मज़बूती दी.साल 2008 के सितंबर महीने में न्यूक्लियर सप्लायर ग्रुप की ओर से भारत-अमेरिका परमाणु समझौते को स्वीकृति दिए जाने के बाद भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा था, ‘इस समझौते ने भारत के परमाणु ऊर्जा से जुड़ी तकनीकों की मुख्य धारा से अलग-थलग रहने और तकनीक से वंचित रखने के दौर का अंत है.”
साल 2016 में पीएम मोदी ने अमेरिकी संसद में कहा था कि भारत और अमेरिका ने ऐतिहासिक हिचकिचाहट से पार पा लिया है.इसके साथ ही उन्होंने आर्थिक और सुरक्षा से जुड़े समझौतों को मज़बूत करने की अपील की. इसके छह साल बाद जेट इंजन और अहम तकनीकों को साझा करने के लिए हुआ समझौता तकनीक साझा करने से वंचित रखने के दौर का अंत और इतिहास की हिचकिचाहटों से पार पाने की शुरुआत है.
अमेरिका की कंप्यूटर मेमोरी चिप विनिर्माता माइक्रोन टेक्नोलॉजी एक बड़ा निवेश कर रही है. यह कंपनी गुजरात में अपना सेमीकंडक्टर असेंबली एवं परीक्षण संयंत्र लगाएगी, जिसपर कुल 2.75 अरब डॉलर (22,540 करोड़ रुपये) का निवेश होगा. दोनों नेताओं ने भारत में सेमीकंडक्टर शिक्षा और कार्यबल के विकास में तेजी लाने के लिए 60,000 भारतीय इंजीनियरों को प्रशिक्षित करने के लैम रिसर्च के प्रस्ताव का स्वागत किया. उन्होंने एक सहयोगी इंजीनियरिंग केंद्र स्थापित करने के लिए 40 करोड़ अमेरिकी डॉलर का निवेश करने के लिए एप्लाइड मैटेरियल्स इंक की घोषणा का भी स्वागत किया.
इस यात्रा में दूसरी खास बात यह हुई कि भारत ने अमेरिका से 31 प्रिडेटर ड्रोन ((Predator Drone Deal India)) खरीदने का सौदा किया। 3 अरब डॉलर की यह सौदा भारत-अमेरिका के बीच 2011 के बाद का सबसे बड़ा रक्षा सौदा है। इसके तहत अमेरिका से MQ 9 ड्रोन (MQ 9 drone) खरीदे जाएंगे। अमेरिकी कंपनी जनरल एटॉमिक्स MQ 9 ड्रोन बनाती है। इस तरह के ड्रोन का दुनिया में बड़ा खौफ है। चीन के पास भी इस तरह के ड्रोन नहीं हैं।
भारत और अमेरिका 2024 में एक भारतीय अंतरिक्ष यात्री को अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (ISS) पर भेजने के लिए सहयोग कर रहे हैं. भारत ने आर्टेमिस समझौते में शामिल होने का भी फैसला किया है, जो समान विचारधारा वाले देशों को नागरिक अंतरिक्ष अन्वेषण पर जोड़ता है, और NASA और ISRO 2024 में ISS के लिए एक संयुक्त मिशन पर सहमत हुए हैं.
1967 की बाहरी अंतरिक्ष संधि (OST) में दरकिनार कर दिया गया आर्टेमिस समझौता ऐसे सिद्धांतों का गैर-बाध्यकारी सेट है, जिसे 21वीं सदी में नागरिक अंतरिक्ष अन्वेषण को निर्देशित करने और इस्तेमाल करने के लिए डिज़ाइन किया गया है. यह 2025 तक मनुष्यों को चंद्रमा पर लौटा लाने का अमेरिकी नेतृत्व वाला मिशन है, जिसका अंतिम लक्ष्य मंगल और उससे आगे अंतरिक्ष अन्वेषण का विस्तार करना है.
बदलते भूरणनीतिक हालात में रूस और चीन एक दूसरे के करीब आ रहे हैं. ऐसे में पश्चिमी देशों के केवल यूरोप और अमेरिका तक सीमित रहना समस्या बन सकता है. वहीं मध्यपूर्व एशिया में भी अमेरिकी रुतबा कम होता जा रहा है ऐसे में अमेरिका को एशिया में तगड़े साझेदारों की जरूरत है और हालात उसे भारत के करीब आने को मजबूर कर रहे हैं. ऐसे मे अमेरिका पर सभी की निगाहें है.
पीएम मोदी की यात्रा का प्रमुख जोर द्वीपक्षीय व्यापारिक संबंधों पर रहा. इसमें कोई शक नहीं कि अमेरिका को भारत के प्रति अपना नजरिया बदलना ही होगा. लेकिन वह भारत के साथ संबंध विश्वसनीय बनाने में कितना समय लगाता है यह देखने वाली बात होगी. अमेरिका भारत के साथ रक्षा सौदों के साथ इसकी शुरुआत कर सकता है. लेकिन द्विपक्षीय व्यापार हमेशा ही भारत अमेरिका के संबंधों पर शीर्ष मुद्दा रहेंगे इससे इनकार नहीं किया जा सकता है क्योकि  भारत की आबादी 140 करोड़ है. दुनिया की नजरों में ये एक बड़ा बाजार है. हर कोई अपना सामान भारत में बेचना चाहता है. इतना ही नहीं, भारत में मिडिल क्लास बढ़ रहा है. उसकी खर्च करने की क्षमता भी बढ़ रही है. अमेरिका की नजर भी भारत के इस बाजार पर है. यही वजह है कि प्रधानमंत्री मोदी के अमेरिकी दौरे के दौरान ही दोनों देशों के बीच चल रहे छह अलग-अलग व्यापारिक मुद्दों को सुलझा लिया गया है, जिसमें टैरिफ का मुद्दा भी शामिल है. इसके अलावा, 2022-23 में अमेरिका, भारत का सबसे बड़ा ट्रेडिंग पार्टनर रहा. दोनों देशों के बीच 10 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा का कारोबार हुआ. अमेरिका के साथ कारोबार करने में सिर्फ उसकी ही नहीं, बल्कि भारत की भी भलाई है. क्योंकि अमेरिका के साथ कारोबार करने में भारत का ट्रेड बैलेंस पॉजिटिव रहता है. वो इसलिए क्योंकि भारत, अमेरिका को बेचता ज्यादा है और वहां से खरीदता कम है!.
पीएम मोदी की ये यात्रा इसलिए भी खास रही, क्योंकि ये बताती है कि खट्टे-मीठे रहे भारत-अमेरिका के रिश्तों में अब बदलाव आ रहा है. दोनों के रिश्ते पहले से कहीं ज्यादा गहरे हुए हैं. पीएम मोदी ये यात्रा इसलिए भी खास रही, क्योंकि इस पर दुनियाभर की नजरें टिकी थीं. इस यात्रा से सबसे ज्यादा मिर्ची चीन को लगी. उसने तो साफ-साफ कह दिया कि चीन का मुकाबला करने के लिए अमेरिका, भारत से दोस्ती बढ़ा रहा है.

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