पुरा देश ध्वनि प्रदूषण व वायु प्रदूषण से बचने के उपाय खोजने में लगा है। जबकि इससे बड़ी समस्या मनोप्रदूषण की है। गांधी जी ने तीन बंदर बनाए थे। उनको एक बंदर और बनाना था जो अपने हृदय पर हाथ रखे होता और संदेश देता कि बुरा मत सोचो।आज मनुष्य के विचारों में आ रहे बदलाव में सुधार की आवश्यकता है। हमारा भोजन ही नहीं विचार भी तामसिक हो गए हैं। हमारी प्रार्थनाभी तामसिक हो चुकी है। हम भगवान से केवल अपने और परिजनों का ही सुख चाहते हैं। दुनिया के बारे में कभी भला नहीं मांगते। ऐसी प्रार्थना ही तामसिक होती है। "कर भला तो हो भला" कोई तुम्हारा बुरा करे तो उसे नजरअंदाज मत करो उसे अपने दिमाग में रखो लेकिन दिल से मत लगाओ क्यों कि दिल से लगाओगे तो फिर तुम्हारा पूरा ध्यान - और शक्ति उसका बुरा करने में लग जायेगी और इस से तुम्हारा और नुकसान होगा जो जैसे करेगे वैसे ही भरेगा उसके लिए तुम्हे अपने समय और शक्ति नष्ट करने कि जरुरत नहीं है। अपने कर्म करो पुरुषार्थ करो दुनिया को कोई ताकत तुम्हारा कुछ नहीं बिगड़ सकती अपने अराध्य कि सच्चे मन से साधना करो और उस पर भरोसा करो ॐ
कश्मीर में पंडितों-सिखों का कत्लेआम: 19 जनवरी 1990 की वह काली रात
कश्मीर में पंडितों-सिखों का कत्लेआम: 19 जनवरी 1990 की वह काली रात 19 जनवरी 1990 को कश्मीर घाटी में जो हुआ, वह केवल एक घटना नहीं थी — वह भारत के संवैधानिक लोकतंत्र, बहुलता और नागरिक सुरक्षा की संस्थागत परीक्षा थी। उस रात नहीं केवल घाटी के हिंदू-सिख अल्पसंख्यक समुदाय के लिए, बल्कि पूरे देश के लिए यह यादगार काला अध्याय बन गया। यह लेख उसी रात के प्रति संवेदनशील, तथ्यों पर आधारित, और विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत करता है, ताकि इतिहास का दायित्व केवल याद रखना नहीं, समझना भी बने। वह ऐतिहासिक पृष्ठभूमि जिसमें अलगाववाद ने हिंसा की राह अपनाई 1980 के दशक के अंत तक कश्मीर घाटी में राजनीतिक असंतोष सामाजिक आंदोलन से ज़्यादा खोखली हो रहा था। सीमापार प्रायोजित हथियारबंद समूह, स्थानीय असंतोष और सामरिक उद्देश्यों ने मिलकर धार्मिक पहचान को हिंसा का आधार बना दिया। जिहादी रुझान और स्थानीय अलगाववाद का संगम उस परिस्थिति को जन्म दे रहा था, जहाँ धार्मिक पहचान के आधार पर सिख, पंडित और हिंदू समुदायों को भय, अनिश्चितता और प्रताड़ना का सामना करना पड़ा। ह...
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